इस बार गूगल का डूडल बंगाली महिला कार्यकर्ता कामिनी रॉय के नाम

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ले पंगा न्यूज डेस्क, चंदना पुरोहित। कामिनी रॉय आज बंगाल की जानी मानी कवयित्री कामिनी रॉय की 155 वी जयंती है। उनका जन्म वसंदा बांग्लादेश में 12 अक्टूबर 1984 को हुआ था। कामिनी का सारा जीवन महिला शिक्षा विकास व साहित्य की रचनाओं में गया। ब्रिटिश भारत में ग्रेजुएट करने वाली वह पहली भारतीय महिला थी। उन्होंने कॉलेज में अध्यापन भी किया। उन्होंने 10 रूट ऑफ ट्री ऑफ नॉलेज नामक निबंध में कहा था कि पुरुष की इच्छा हमेशा राज करने की होती है इसलिए महिलाओं को वह पढ़ने नहीं देते। महिला बुद्धि पर वह संदेह करते हैं क्योंकि वह डरते हैं की वह पुरुषों की बराबरी ना कर लें।

गूगल ने आज अपना डूडल बंगाली कवयित्री, कार्यकर्ता और शिक्षाविद् कामिनी रॉय को समर्पित किया है। वे अपने जीवन में महिला अधिकारों के प्रति समर्पित रही। उस दौर में जहां भारतीय महाद्वीप में महिलाओं के प्रति कुप्रथाएं समाज में मौजूद थी, उस दौरान कामिनी रॉय ने महिलाओं के अधिकारों और उनकी पढ़ाई की वकालत की। कुलीन परिवार में जन्मी रॉय के भाई कोलकाता के मेयर रहे थे और उनकी बहन नेपाल के शाही परिवार की फिजिशियन थीं। कॉलेज में अपने साथ पढ़ने वाली अबला बोस जो की महिलाओं के लिए काम करती थी वही कामिनी की प्रेरणा बनी।

कामिनी ने महिलाओं को कविता साहित्य के लिए प्रेरित किया। उन्होंने हर जगह महिला शिक्षा पर जोर दिया। उन्होंने लिली सेन के साथ मिलकर देगी या नारी समाज का प्रतिनिधित्व करके पूरे बंगाल में महिला उत्थान आंदोलन चलाया। उन पर रविंद्र नाथ टैगोर तथा संस्कृत साहित्य का हमेशा प्रभाव रहा। उनकी प्रमुख साहित्यकार रचना बालिका प्रखर बहुत आदर्श थी। उनके आखिरी दिनों में वह हजारीबाग में रही और फिर वहीं 27 सितंबर 1933 को उनका देहांत हो गया।

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