जरुरत है न्यूनतम आय की, न्यूनतम आय से हो सकता है हर व्यक्ति का विकास…!

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ले पंगा न्यूज डेस्क, चंदना पुरोहित। भारत और दुनिया के कई देशों में गरीब परिवारों को बेसिक इनकम दी जाए यह बड़ा चर्चा का विषय है। इस पर अर्थशास्त्रियों की राय देश के अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाली असर पर आकर रुक जाती है तो वहीं अगर सरकार की और से बेसिक इनकम राशि का भुगतान की घोषणा होती है तो यह स्किम भी राजनैतिक स्वार्थ की दिशा पकड़ सकती है। वही कुछ का मानना है की मुफ्त में एक आय गरीब परिवारों तक पहुंचने से उनकी उत्पादकता घट सकती है। किन्तु युनिवर्सल बेसिक इनकम के सर्वे सकारात्मक परिणाम दर्शाते हैं।

हाल ही में बेसिक इनकम के परिणामों को जानने के लिए एक सर्वे किया गया। इस सर्वे में 20 गावों का चयन किया गया जिनमे से 8 गावों को नकद राशि दी गई और बाकि गावों को दी गई। यही सर्वे आदिवासी गावों में भी किया गया। यह सर्वे 12 महीनों तक चला और इसमें 6000 लोगो को नकद राशि दी गई। इस सर्वे के मुताबिक़ जिन गावों में नकद राशि दी गई उस गांव के बच्चों के पोषण में सुधार दिखाई दिया। इन गावों में स्वास्थ्य सुधार दिखाई दिया जिसकी वजह अच्छा पोषण और इलाज मालूम पड़ा। इन गावों में कृषि और शिक्षा पर अधिक व्यय हुआ और लोगों की उत्पादकता में भी वृद्धि हुई।

अर्थशास्त्र की दृष्टि से बात करें तो देश के 20 करोड़ परिवारों को अगर यह नकद 1000 रूपए की राशि दी जाती है तो 240000 करोड़ रूपए का खर्च होगा जो की सरकार के बजट का 10 फीसदी है। 167 लाख की जीडीपी में यह आंकड़ा 1.5 फीसदी है। हम सर्वे की बात माने तो लोक कल्याण और देश की प्रगति के लिए हर व्यक्ति को बेसिक इनकम मिलनी चाहिए और अगर देश की अर्थव्यवस्था की बात करें तो देश की आर्थिक स्थिति ऐसी किसी स्किम को करने के लिए खुद गरीब है।

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