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जात-पात का भेद-भाव मिटाने के लिए हुआ भगवान महावीर का जन्म

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ले पंगा न्यूज डेस्क, अशोक योगी। सम्पूर्ण दुनिया में आज के दिवस महावीर जयंती बड़े ही हर्षोल्‍लास के साथ मनाई जाती है। ग्रन्थों के अनुसार जैन धर्म के 24 वें तीर्थकर भगवान महावीर का जन्म चैत्र माह में शुक्ल त्रयोदशी को हुआ था इसलिए इस दिवस को महावीर जयंती मनाई जाती है। हिंसा, पशुबलि, जात-पात का भेद-भाव जिस युग में बढ़ गया, उसी युग में भगवान महावीर का जन्म हुआ। महावीर ने दुनिया को सत्य, अहिंसा का पाठ पढ़ाने के साथ अहिंसा को सर्वोपरि बताया और जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत दिए है। महावीर ने इनमें अहिंसा, सत्‍य, अपरिग्रह, अस्‍तेय और ब्रह्म्‍चर्य शामिल किया है। उन्होंने अनेकांतवाद, स्यादवाद और अपरिग्रह जैसे अद्भुत सिद्धांत दिए है।  भगवान महावीर  का आत्म धर्म जगत की प्रत्येक आत्मा के लिए समान था। दुनिया की सभी आत्मा एक-सी हैं इसलिए हम दूसरों के प्रति वही विचार एवं व्यवहार रखें जो हमें स्वयं को पसंद हो। यही महावीर का ‘जियो और जीने दो’ का सिद्धांत है।

इस दिन महावीर की मूर्ति का किया जाता है अभिषेक

गौरतलब है कि जैन धर्म में महावीर जयंती का विशेष महत्व है। यह जैन धर्म के प्रमुख त्‍योहारों में से एक है। महावीर जयंती को महावीर स्‍वामी जन्‍म कल्‍याणक के नाम से भी जाना जाता है। महावीर जयंती के दिन जैन मंदिरों में महावीर की मूर्तियों का अभिषेक किया जाता है। इसके बाद मूर्ति को एक रथ पर बिठाकर जुलूस निकाला जाता है। इस यात्रा में जैन धर्म के अनुयायी बढ़चढ़कर भाग लेते हैं।

महावीर के बचपन का नाम वर्धमान था

ग्रंथों के अनुसार भगवन महावीर का जन्म ईसा से 599 वर्ष पहले वैशाली गणतंत्र के कुण्डलपुर में इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रिय राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के यहां चैत्र शुक्ल तेरस को हुआ था। इनके जन्म के बाद राज्य में उन्नति होने से उनका नाम वर्धमान रखा गया था। बताया जाता है कि वे बचपन से ही साहसी, तेजस्वी और अत्यंत बलशाली थे, इस ही कारण लोग उन्‍हें महावीर के नाम से पुकारते थे। उन्‍होंने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया था, इसलिए इन्हें ‘जीतेंद्र’ भी कहा जाता है। जैन ग्रंथ उत्तरपुराण में वर्धमान, वीर, अतिवीर, महावीर और सन्मति ऐसे पांच नामों का उल्लेख है। महावीर ने कंलिग के राजा की बेटी यशोदा से शादी भी की लेकिन 30 साल की उम्र में उन्‍होंने घर छोड़कर सन्यासी बन गए थे।

महावीर ने स्वयं से लड़ने की दी प्रेरणा

भगवान महावीर की पूजा करने से स्वयं के दोषों से लड़ने की प्रेरणा मिलती है। महावीर ने उपदेश में कहा है कि स्वयं से लड़ो, बाहरी दुश्मन से क्या लड़ना? वह जो स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेगा उसे आनंद की प्राप्ति होगी। हर मनुष्य की आत्मा अपने आप में सर्वज्ञ और आनंदमय है। आनंद को कभी बाहर से प्राप्त नहीं किया जा सकता। आत्मा अकेले आती है और अकेले चली जाती है, न कोई उसका साथ देता है और न ही कोई उसका मित्र बनता है।

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