नंदगांव की गोपियों ने ग्वालों पर बरसाये लट्ठ

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ले पंगा न्यूज डेस्क, प्रीति दादूपंथी। होली रंगों का त्योहार है और इस त्योहार के आने में कुछ ही समय शेष है। रंगों के त्योहार की बात हो ओर बरसाना की लट्ठमार होली का जिक्र ना हो ऐसी तो हो ही नहीं सकता। इस होली की तैयारियों को लेकर नंदगांव के भगवान कृष्णरूपी हुरियारे और बरसाना की श्रीराधारानी स्वरूप हुरियारिनें महीनों पहले तैयारियों में जुट जाते हैं। सालभर घरों में सामान्य से रहने वाली बरसाना की गोपियों (हुरियारिनों) पर होली के समय असाधारण और आलौकिक तेज देखने को मिलता है, जब ये अपने हाथों में तेल से चमचमाती लाठी लिए सोलह श्रृंगार कर हुरियारों पर लठ बरसाती हैं।

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बरसना में लट्ठमार होली

भगवान कृष्ण की साथी राधा के जन्म स्थान बरसाना की लट्ठमार होली सबसे अनूठे तरीके से मनाने के लिए विश्वप्रसिद्ध है। बरसाने की लट्ठमार होली फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाई जाती है। इस दिन नंदगांव के ग्वाल बाल होली खेलने के लिए राधा रानी के गांव बरसाने जाते हैं और विभिन्न मंदिरों में पूजा अर्चना के पश्चात नंदगांव के युवक होली खेलने बरसाना गांव में आते है और बरसाना गांव के लोग नंदगांव में जाते हैं। इन पुरूषों को होरियारे कहा जाता है। बरसाना की लट्ठमार होली के बाद अगले दिन यानी फाल्गुन शुक्ला दशमी के दिन बरसाना के हुरियार नंदगांव की हुरियारिनों से होली खेलने उनके यहां पहुंचते हैं। तब नंदभवन में होली की खूब धूम मचती है।

गौरतलब है कि बरसाना की लट्ठमार होली भगवान कृष्ण के काल में उनके द्वारा की जाने वाली लीलाओं की पुनरावृत्ति जैसा है। मान्यताओं के अनुसार कृष्ण अपने सखाओं के साथ इसी प्रकार कमर में फेंटा लगाए राधा रानी तथा उनकी सखियों से होली खेलने पहुंच जाते थे और उनके साथ ठिठोली करते थे, जिस पर राधारानी तथा उनकी सखियां ग्वालों पर डंडे बरसाया करती थीं। ऐसे में लाठी-डंडों की मार से बचने के लिए ग्वाल वृंद भी लाठी या ढालों का प्रयोग किया करते थे जो धीरे-धीरे होली की परंपरा बन गया। उसी का परिणाम है कि आज भी इस परंपरा का निर्वहन उसी रूप में किया जाता है।

अनोखा अंदाज

इस अवसर पर नंदगांव के युवक और बरसाने की महिलाएं मुख्य रूप से भाग लेते हैं। युवक जब रंगों की पिचकारियां लिए बरसाना आते हैं तो उनपर यहां की महिलाएं खूब लाठियां बरसाती है। युवकों को इन लाठियों से बचना होता है और महिलाओं को रंगों से भिगोना भी होता है। विभिन्न मंदिरों में पूजा अर्चना के पश्चात नंदगांव के युवक होली खेलने बरसाना गांव में आते हैं। इन पुरूषों को होरियारे कहा जाता है। बरसाना की लट्ठमार होली के बाद अगले दिन बरसाना के हुरियार नंदगांव की हुरियारिनों से होली खेलने उनके यहां पहुंचते हैं। इन गांवों के लोगों का विश्वास है कि होली की लाठियों से किसी को चोट नहीं लगती है। इस दौरान रंग तो उड़ता ही है साथ ही भांग और ठंडाई का भी दौर चलता है। कई कीर्तन मंडलियां राधा और कृष्ण से जुड़े लोक गीत ‘होरी’गा कर रंग जमाती हैं। कहा जाता है कि “सब जग होरी, जा ब्रज होरा” याने ब्रज की होली सबसे अनूठी होती है।

गोपियों बढ़ा रही ताकत

नंदगांव के ग्वालों पर प्रेम में लाठियां बरसाने में बरसाना की गोपियां कहीं थक ना जाएं, इसके लिए दो माह पहले से ही वे दूध, घी, मेवा और फल खाकर ताकत बढ़ा रही है। यही नहीं गोपियों की लाठियों की मार को सहने के लिए नंदगांव के ग्वाले भी अपनी ढालों को दुरुस्त करने में जुट गए है। यहां की रंगीली गली को तो आकर्षक वॉल पेंटिंग बनाकर भव्य रूप दिया गया है।

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