पांच राज्यों में बीजेपी पड़ रही अकेली

लोकसभा 2019,

ले पंगा न्यूज डेस्क। देवेन्द्र कुमार। अगले महीने में 11 तारीख से 2019 लोकसभा चुनाव के मतदान शुरू हो जाएंगे। लोकसभा चुनाव 11 अप्रैल से हैं इसलिए अब चुनावों में ज्यादा समय बाकि नहीं रह गया है। इसलिए सभी राजनीतिक दल इस जुगत में लगे हुए हैं कि ज्यादा से ज्यादा दलों के साथ गठबंधन कैसे किया जाए। पिछली बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जहां 16 दलों के साथ गठबंधन किया था वहीं इस बार भाजपा 29 दलों के साथ गठबंधन कर चुकी है। लेकिन पांच राज्य ऐसे हैं जहां पर बीजेपी को अपना साथी नहीं मिल पा रहा है। लाख कोशिशों के बावजूद बीजेपी को पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, केरल व तेलंगाना में गठबंधन के लिए कोई साथी नहीं मिल रहा है। आपको बता दें कि 2014 के आम चुनाव में भाजपा को इन पांचों राज्यों में सिर्फ 6 सीटें ही मिली थीं।

तेलंगाना में हैं अकेले

2014 के लोकसभा चुनाव के बाद 2 जून, 2014 को तेलंगाना राज्य का गठन हुआ था। भाजपा इस बात की उम्मीद लगाकर बैठी थी कि राज्य की सबसे ताकतवर पार्टी तेलंगाना राज्य समिति (टी.आर.एस.) से गठबंधन हो जाएगा। लेकिन भाजपा ने टी.आर.एस. के आगे शर्त रखी कि वह तभी एन.डी.ए. में शामिल हो सकेगी जब वह असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन (ए.आई.एम.आई.एम.) का साथ छोड़ देगी। भाजपा की इस शर्त ने गठबंधन का सारा खेल बिगाड़ दिया और भाजपा को निराशा के अलावा कुछ नहीं मिल पाया। टी.आर.एस. अध्यक्ष के. चंद्रशेखर राव ने भाजपा को साफ संदेश दे दिया कि वह भाजपा से गठबंधन के लिए अपने दोस्तों को नहीं छोड़ सकती। राज्य में भाजपा की पुरानी सहयोगी टी.डी.पी. ने पिछले साल ही भाजपा से किनारा कर लिया था। अब टी.आर.एस. और पवन कल्याण की जना सेना पार्टी की बेरुखी ने राज्य में भाजपा सपने को चकनाचूर कर दिया।

पश्चिम बंगाल में भी नहीं हो पाया गठबंधन

पश्चिम बंगाल की राजनीति की बात करें तो इस राज्य में वामपंथी विचारधारा हमेशा से हावी रही है। पिछले साल बंगाल में हुए निकाय चुनावों में भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन वह दूसरे नंबर पर रही थी। अमित शाह इस बार खुद बंगाल की राजनीति में रुचि ले रहे हैं लेकिन राज्य में चुनाव लड़ने के लिए वो साथी को खोज पाने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। इतना ही नहीं राज्य में पुराने साथियों ने भी साथ झोड़ दिया है। इस साल 19 जनवरी को भाजपा के 10 साल पुराने साथी गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने अलग गोरखालैंड राज्य की मांग न माने जाने और संसद में सरकार द्वारा लाए गए सिटीजनशिप बिल के विरोध में भाजपा से किनारा कर लिया। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने अब तृणमूल कांग्रेस (टी.एम.सी.) को समर्थन देने का फैसला किया है। पिछले साल राज्य को विशेष दर्जे की मांग पूरी न होने के कारण तेलगू देशम पार्टी (टी.डी.पी.) एन.डी.ए. सरकार से बाहर हो गई थी। 2014 के आम चुनाव में टी.डी.पी. के समर्थन के चलते ही भाजपा को राज्य में 3 सीटें मिलीं।

ओडिशा में भी हुए असफल

ओडिशा में बीजू जनता दल (बी.जे.डी.) के अध्यक्ष नवीन पटनायक अपना जादू चलाने में अभी भी कायम है। एन.डी.ए. गठबंधन में शामिल जनता दल यूनाइटेड (जे.डी.यू.) के अध्यक्ष नीतीश कुमार नवीन पटनायक के अच्छे दोस्त माने जाते हैं। दोस्ती की वजह से ही पिछले साल राज्यसभा के उपसभापति चुनाव में बी.जे.डी. ने अपने दोस्त की पार्टी जे.डी.यू. के उम्मीदवार को समर्थन दिया था। भाजपा इस बात की उम्मीद कर रही थी कि नीतीश कुमार नवीन पटनायक को एन.डी.ए. में शामिल करने के लिए सफल हो जाएंगे। भाजपा ऐसा इससिलए सोचती थी कि क्योंकि भाजपा और बी.जे.डी. का दुश्मन एक ही है-कांग्रेस। आपको बता दें कि नवीन पटनायक ने नोटबंदी, सर्जीकल स्ट्राइक और राफेल पर भाजपा को समर्थन दिया है। भाजपा उम्मीद कर रही है कि चुनाव के बाद शायद बी.जे.डी. एन.डी.ए. में शामिल हो जाए!

केरल में 2014 के लोकसभा चुनाव में भले ही भाजपा एक भी सीट जीत नहीं पाई थी लेकिन सबरीमाला विवाद के बाद भाजपा और आर.एस.एस. की उम्मीद जगी है कि वह केरल की कुल 20 सीटों में से कम से कम 4 सीटें-तिरुवनंतपुरम, पथानामथिट्टा, त्रिशूर और पलक्कड़ में जीत दर्ज कर लेंगे। जीत की संख्या को और बढ़ाने के लिए भाजपा गठबंधन के लिए भारत धर्म जन सेना पार्टी से बात कर रही थी लेकिन राज्य भाजपा के अंदर मतभेद और भारत धर्म जन सेना के नेता तुषार वेल्लप्पल्ली के संदेह के चलते मामला अधर में लटक गया है।

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