मोदी और शाह को मिल रही क्लीन चिट पर चुनाव आयोग में ही मतेभद शुरू

लोकसभा 2019,

ले पंगा न्यूज। देवेन्द्र कुमार। लोकसभा चुनावों के दौरान नेताओं में मतभेद देखने को मिल रहे थे। नेता पार्टी बदल रहे थे। एक दूसरे पर जुबानी जंग चल रही थी। लेकिन लोकसभा चुनाव खत्म होने से पहले एक नया ही मामला सामने आया है। मामला यह है कि चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा को एक पत्र लिखा है। लवासा ने अरोड़ा को लिखे पत्र में इस बात की मांग की है कि आयोग के फैसलों में आयुक्तों के बीच मतभेद होने पर इसे भी आधिकारिक रिकॉर्ड में शामिल किया जाए। बता दें कि अशोक लवासा आचार संहिता तोड़ने से जुड़े आयोग के कई फैसलों पर असहमति जता चुके हैं।

सूत्रों की माने तो अशोक लवासा आचार संहिता उल्लंघन के मामले में पीएम मोदी व बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को आयोग की ओर से मिल रही क्लीन चिट और विरोधी दलों को मिल रहे नोटिसों के खिलाफ हैं। अशोक लवासा देश के अगले मुख्य चुनाव आयुक्त बनने की कतार में हैं।

सुनिल अरोड़ा ने कही ये बात

जब आयुक्त अशोक लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा को पत्र लिखा तो इस पर अरोड़ा ने कहा कि , ‘चुनाव आयोग में 3 सदस्य होते हैं और तीनों एक-दूसरे के क्लोन नहीं हो सकते। मैं किसी भी तरह के बहस से नहीं भागता। हर चीज का वक्त होता है।’

लवासा ने चिट्ठी में लिखी ये बात

सूत्रों के अनुसार चुनाव आयोग की बैठक में अपने अलग मत के कारण सुर्खियों में रहे आयुक्त अशोक लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त को जो चिट्ठी लिखी है उसमें लवासा ने कहा है कि यदि 3 सदस्यीय आयोग में से एक सदस्य का भी विचार अलग होता है तो उसे आदेश में बाकायदा लिखा जाना चाहिए। बता दें कि लवासा चुनाव आयोग में भी वैसी ही व्यवस्था चाहते हैं जैसी सुप्रीम कोर्ट में होती है। लवासा का कहना है कि जिस तरह से कोर्ट की खंडपीठ या विशेष पीठ में किसी केस की सुनवाई के बाद फैसला सुनाते वक्त अगर किसी जज का फैसला सहमति से लिए गए फैसले के विपरित रहता है तो भी उसका फैसला रिकॉर्ड किया जाता है।

बता दें कि चुनाव आयोग के नियमानुसार तीनों आयुक्तों के अधिकार क्षेत्र और शक्तियां बराबर होती हैं। यदि किसी भी मुद्दे पर विचारों में मतभेद होता है तो बहुमत का फैसला ही मान्य होगा। फिर चाहे मुख्य निर्वाचन आयुक्त ही अल्पमत में क्यों ना हों।

सूत्रों का कहना है कि अशोक लवासा ने अपने पत्र में यह भी लिखा है कि जब तक उनकी मांग के अनुरूप व्यवस्था नहीं बन जाएगी तब तक वो बैठक में शामिल ही नहीं होंगे।

सुप्रीम कोर्ट भी आयोग को डांट चुका है

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट भी चुनाव आयोग को इस बात के लिए डांट चुका है कि वो अपने अधिकारों का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर रहा है। कोर्ट आयोग की इस बात को लेकर भी आलोचना कर चुका है कि आयोग को आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़ी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की ओर से मिलने वाली शिकायतों का आयोग जल्द निपटारा नहीं करता है। बता दें कि चुनाव आयोग नरेंद्र मोदी और अमित शाह को कई मामलों में क्लीन चिट दे चुका है। जबकि इन दोनों नेताओं के खिलाफ अपने चुनावी भाषणों में सेना की सर्जिकल स्ट्राइक का राजनीतिक जिक्र और विरोधियों के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे।

इस बार के लोकसभा चुनाव में विपक्ष लगातार चुनाव आयोग की भूमिका पर लगातार सवाल उठता रहा है। विपक्ष ने खुलकर आयोग पर आरोप लगाते हुए कहा कि आयोग निष्पक्ष रूप से फैसले नहीं ले रहा है। पश्चिम बंगाल में अमित शाह के रोड शो के दौरान हुई हिंसा के बाद आयोग ने तय समय से 20 घंटे पहले ही चुनाव प्रचार पर रोक लगा दी। इस बात पर भी आयोग को आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। तय समय से पहले प्रचार पर रोक लगाने के चुनाव आयोग के फैसले के बाद बंगाल की सीएम ममना बनर्जी ने इस बात का दावा किया कि चुनाव आयोग मोदी और शाह के इशारे पर काम कर रहा है तो दूसरी ओर बीजेपी भी ऐसे ही आरोप लगाती रही है।

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