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यहां कांग्रेस को संवीवनी की दरकार, भाजपा-सपा रहीं हैं भारी

लोकसभा 2019,

ले पंगा न्यूज़ डेस्क । भले ही प्रियंका गांधी वाड्रा के राजनीति में कदम रखने के बाद कांग्रेस महासचिव बनने से कांग्रेसी नेता और कार्यकर्ता जोश में हों और पूर्वी यूपी की कमान संभालने ही यहां प्रियंका की सक्रियता बढ़ी हो लेकिन यहां की एक लोकसभा सीट है फिरोज़ाबाद, जहां कांग्रेस इंदिरा लहर के बाद से ही जैसे वनवास पर है। बात करें पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के हार-जीत के आंकड़ों की तो यहां कांग्रेस अब तक वेंटीलेटर पर है। कांग्रेस प्रत्याशियों को 2009 में हुए उपचुनाव को छोड़ दें तो यहां लगातार शर्मनाक पराजय ही मिली है। बीते विधानसभा चुनाव में भी इसका असर देखने को मिला और यहां गठबंधन में पांच में से एक पर भी कांग्रेस का उम्मीदवार जीत नहीं सका।

कभी फिरोजाबाद था सपा का गढ़, 1991 से तीन बार जीती भाजपा

उत्तरप्रदेश की फिरोजाबाद लोकसभा सीट, जहां से कांग्रेस के रघुवीर सिंह पहले सांसद चुने गये थे, लेकिन अगले ही चुनाव में यह सीट कांग्रेस के हाथ से फिसल गई। इसके बाद मानो एक बार कांग्रेस, एक बार अन्य का क्रम बने रहने का सिलसिला चल पड़ा। तभी देश की सियासत में सपा संरक्षक मुलायम सिंह का उदय हुआ और फिरोजाबाद सीट पर मुलायम का दबदबा बढ़ गया। मुलायम द्वारा सपा के गठन के बाद तो फिरोजाबाद की लोकसभा सीट सपा के अभेद किले के रूप में जानी जाने लगी। इसके बाद लगातार कांग्रेस हारते हुए यहां गर्त में चली गई और मुकाबला बीजेपी बनाम सपा होता चला गया। बीजेपी ने साल 1991 से 1998 के दरमियान तीन बार हुए लोकसभा चुनाव में लगातार विजय पताका फहराया, लेकिन इसके बाद बीजेपी भी यहां नहीं टिक पाई और जनता ने सपा प्रत्याशी को जिताकर राज सौंप दिया।

जातीय राजनीति का शिकार हुई कांग्रेस 1984 के बाद से उभर नहीं पाई

देश में 60 वर्षों तक शासन करने वाली कांग्रेस फिरोजाबाद में जातीय राजनीति का शिकार हो गई और अब तक नहीं उभर पाई। यहां लगातार कांग्रेस प्रत्याशी शर्मनाक हार का सामना करते गये और स्थानीय गुटबाजी के चलते कांग्रेस गर्त में चली गई। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी मानते हैं कि कांग्रेस की यह हालत की जिम्मेदार यहां स्थानीय गुटबाजी और जातीय राजनीति है। इंदिरा लहर के दौरान साल 1984 के लोकसभा चुनाव में फिरोजाबाद सीट कांग्रेस के खाते में गई थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन शर्मनाक रहा और जिले की चार में से केवल एक विधानसभा सीट पर कांग्रेस जीत पाईं। वो सीट थी टूंडला, जहां कांग्रेस नेता अशोक सेहरा अपनी विरासत बचाने में कामयाब रहे। साल 2007 में तो कांग्रेस की हालत इतनी बिगड़ गई कि टूंडला सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी को मात्र 800 मत ही मिले।

साल 2009 के उप चुनाव में कांग्रेस के राज बब्बर जीते

फिरोजाबाद में इंदिरा लहर के बाद लगातार सिमटती गई कांग्रेस को साल 2009 के उपचुनाव में जीत मिली और फिल्म अभिनेता व कभी समाजवादी रहे टूंडला के राज बब्बर जीतकर सांसद बने। 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी को यहां महज 5000 वोट ही मिले थे जबकि बाद में उप चुनाव में राज बब्बर ने 90 हजार वोटों से जीत हासिल कर कांग्रेस को वापिस यहां पनपाया था। अब स्थानीय कांग्रेस भी मानती है कि यहां कांग्रेस को संजीवनी की सख्त दरकार है, क्योंकि सैफई परिवार के आमने-सामने के बाद अब यह सीट वीआईपी बन चुकी है और यहां बड़े चेहरे को उतारने की मांग हो रही है।

एक नजर अब तक के 16 चुनाव और एक उप चुनाव पर नजर

यूपी की फिरोजाबाद लोकसभा सीट पर साल 1952 कांग्रेस के रघुवीर सिंह जीत कर पहले सांसद चुने गये। इसके बाद 1957 के चुनाव में सेसोपा से ब्रजराज सिंह, 1962 में कांग्रेस के शंभूनाथ चतुर्वेदी, 1967 में सेसोपा के शिवचरनलाल वाल्मिकी, 1971 में कांग्रेस के छत्रपति अम्बेश, 1977 में जनता पार्टी से रामजीलाल सुमन, 1980 में दमकिपा से राजेश कुमार, 1984 में कांग्रेस के गंगाराम, 1989 में जनता दल के रामजीलाल सुमन और इसके बाद साल 1991 से 1998 तक तीन बार लगातार बीजेपी के प्रभूदयाल कठेरिया सांसद रहे। इसके बाद साल 1999 और 2004 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी के रामजीलाल सुमन दो बार सांसद चुने गये। 2009 में भी यहां समाजवादी पार्टी का ही कब्जा रहा और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव यहां से जीतकर लोकसभा पहुंचे। लेकिन 2009 में अखिलेश यादव ने उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में पद संभाला और यहां उप चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस प्रत्यासी फिल्म अभिनेता राज बब्बर ने जीत दर्ज की। लेकिन ये जीत साल 2014 के चुनावों में कांग्रेस से फिर फिसल गई और समाजवादी पार्टी के अक्षय यादव ने यहां से जीते और लोकसभा पहुंचे।

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