लिव इन रिलेशन के लिए भी हो क़ानून

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ले पंगा न्यूज डेस्क, चंदना पुरोहित। राज्य मानवाधिकार आयोग ने लीव इन रिलेशन में रहने वालों के लिए अलग से कानून बनाने की राज्य सरकार से सिफारिश की है। आयोग ने कहा है की वैवाहिक संबंधो में स्वच्छंदता को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए। ऐसे किसी भी संबंंध को जो वैवाहिक है समाज की स्वीकार्यता होनी चाहिए। लिव इन रिलेशनशिप से बच्चों की जिम्मेदारी किसकी यह साफ़ नहीं होता। कोई कानून नहीं है की लिव इन रिलेशन कैसे चलेंगे या कैसे टूटेंगे। मानवाधिकार आयोग का कहना है की बच्चो की जिम्मेदारी और लिव इन संबंध कैसे चलेंगे इसे परिभाषित करने की सख्त आवश्यकता है। अगर लिव इन रिलेशन के लिए कानून नहीं बना तो महिलाओं के अधिकारों का दमन हो सकता है।

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सरकारों को लिव इन रिलेशन को प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए। जरुरत यह है की लिव इन रिलेशन के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाने की जरुरत है। लोगो को लिव इन रिलेशन के नुकसान पता होने चाहिए। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार को योग्य कदम उठाने चाहिए।
राज्य मानवाधिकार आयोग ने लिव इन रिलेशन पर कानून बनाने के साथ साथ उनका पंजीकरण की भी मांग की है। आयोग ने लिव इन के विच्छेद के लिए भी जिला जज के आदेशों से ही हो यह मांग की है।

आयोग का कहना है की संविधान के अनुच्छेद 21 इंसान को सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार देता है और बिना विवाह साथ रहना कभी भी सम्मानजनक नहीं हो सकता। भारत में लिव इन रिलेशन अवैध नहीं है और नहीं लिव इन रिलेशन को लेकर कोई कानून है। जैसे शादी को लेकर भारत में शादी कैसे हो, विवाह विच्छेद कैसे हो उत्तराधिकार, पालन पोषण को लेकर हर विषय पर कानून बना हुआ है। उसी तरह लिव इन रिलेशन को लेकर कोई कानून नहीं है की ये संबंध कैसे स्थापित होगा। इस संबंध से आपत्य की वैधता के बारे में कोई कानून नहीं है और नहीं इस संबंध के खत्म करने के विषय में कोई कानून है।

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#राज्यमानवाधिकारआयोग #लिवइनरिलेशन

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