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लोकसभा चुनाव में राजपूत समुदाय होगा निर्णायक, कई राजघराने के सदस्य होंगे प्रत्याशी

लोकसभा 2019,

लेपंगा न्यूज डेस्क, अशोक योगी। “राजपूतों के बिना हिंदुस्तान के इतिहास की कल्पना नहीं की जा सकती।” ये बात कर्नल जेम्स टॉड ने कही थी। जोकि राजस्थान की राजनीति के संदर्भ में देखें तो यह बात इतिहास ही नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी सटीक बैठती है। 1952 में हुए पहले आम चुनाव के बाद से ही राजस्थान की लोकतांत्रिक राजनीति का ताना-बाना राजपूतों के इर्द-गिर्द दौड़ता नजर आता है। राजपूतों समुदाय का प्रभाव ही था जिसने राजशाही के मुखर विरोधी प्रजामंडल आंदोलन के प्रमुख नेता जयनारायण व्यास को भी जसवंत सिंह (दाउदसर) जैसे जागीरदारों को कांग्रेस में शामिल करने की पैरवी के लिए मजबूर कर दिया था। प्रदेश की राजनीति में राजपूतों के निर्णायक होने का जो सिलसिला जोधपुर के पूर्व महाराज हनवंत सिंह के साथ शुरु हुआ था वह पूर्व मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत से लेकर खुद को राजपूत बेटी कहने वाली मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और हाल ही में भाजपा से बाग़ी होकर कांग्रेस में शामिल हुए मानवेंद्र सिंह तक बरकरार है।

राजपूत प्रत्याशियों को तुलनात्मक तौर पर टिकट देती है पार्टी

गौरतलब है कि पिछले दो साल में कुछ राजपूत संगठनों ने फिल्म पद्मावत और कुख्यात अपराधी आनंदपाल के एनकाउंटर की जांच को लेकर जिस तरह उत्पात मचाया, इनसे राजपूत समुदाय की उसी सामंतवादी छवि को पुष्ट करने का काम किया जिसे साहित्य और सिनेमा ‘ठाकुर दुर्जन सिंह या शैतान सिंह’ जैसे किरदारों के रूप में दिखाता आया है। यह घटनाक्रम अपने पीछे कुछ बड़े सवालों की भरपूर गुंजाइश भी छोड़ता दिखता है। जैसे- क्या राजस्थान के सभी राजपूत इतने ही सामंतवादी हैं? यदि हां, तो फिर क्यों राजस्थान की जनता उन्हें लोकतंत्र के कई दशक बाद भी चुनाव दर चुनाव मजबूत करती आ रही है? इधर, प्रदेश से लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने 16 उम्मीदार को टिकट दिया है जिसमें से 4 उम्मीदवार इसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। राजनैतिक विशेषज्ञ बता रहे है कि कांग्रेस पार्टी भी चार-पांच उम्मीदवारों को टिकट दे सकती है। राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस राजपूत प्रत्याशियों को तुलनात्मक तौर पर टिकट देती नजर आई है। राजस्थान के अलावा उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की राजनीति में भी राजपूतों का जबरदस्त वर्चस्व है। लेकिन राजस्थान के मामले में यह बात इसलिए दिलचस्प हो जाती है कि दूसरे प्रदेशों की तुलना में यहां राजपूत आबादी (अनुमानित पांच से छह फीसदी) ना कुछ के बराबर है। तो फिर राजस्थान की राजनीति में राजपूतों का इतना असर क्यों है। वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ बताते हैं, ‘खुद को लेकर प्रबल आग्रह रखने वाले समुदायों या जातियों की छवि अतिवादी के तौर पर स्थापित हो जाती है. लेकिन राजस्थान में राजपूत खुद को अपेक्षाकृत सौहार्दप्रिय के तौर पर स्थापित करने में सफल रहे हैं. बारेठ के शब्दों में ‘दूसरे प्रदेशों की तरह राजस्थान के कुछ इलाकों में भी इस कौम से जुड़े लोग अराजकता फैलाते रहे हैं। लेकिन फिर भी सूबे में बड़े स्तर पर इसकी सामाजिक स्थिति सम्मानजनक है।’

राजपूतों पर भरोसा करती है जनता

राजस्थान में दलित, जनजाति और अल्पसंख्यकों के बीच भी राजपूतों को लेकर अपेक्षाकृत अधिक भरोसा महसूस किया जा सकता है। राजस्थान की जनजातियों के बीच भी राजपूतों के प्रति एक सकारात्मक भाव महसूस किया जा सकता है। इतिहासकार महाराणा प्रताप के दौर से ही भील और गाड़िया-लोहार समुदायों के बीच राजपूतों के प्रति सद्भाव का ज़िक्र करते हैं। यहां भी राजपूतों के प्रति अपेक्षाकृत ज्यादा सहजता देखी जा सकती है। दरअसल राजस्थान के एक छोर पर स्थित बीकानेर से आने वाले राजपूत नेता देवीसिंह भाटी बिना किसी संगठन की मदद के ही दूसरे सिरे पर स्थित कोटा में सहजता से हजारों की सभा कर आते थे। ऐसी ही कुछ स्थिति कल्याण सिंह कालवी की भी बताई जाती थी। लेकिन प्रदेश के दूसरे किसी समुदाय के नेता के लिए ऐसा करना टेढ़ी खीर है. उदाहरण के लिए समझें तो पश्चिम राजस्थान से आने वाले दिग्गज जाट नेता हनुमान बेनीवाल के लिए जाट रियासत रह चुके भरतपुर में ही मानो ‘नो-एंट्री’ का बोर्ड लगा है। वहीं सूबे की मीणा राजनीति के सिरमौर किरोड़ीलाल मीणा की अदिवासी बहुल दक्षिण राजस्थान में कुछ खास पकड़ नहीं बताई जाती। पहले मानवेंद्र सिंह की स्वाभिमान रैली में ‘श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना’ के संस्थापक सुखदेव सिंह गोगामेड़ी को मंच पर जगह न मिलने और बीते दिनों ‘श्री राजपूत करणी सेना’ के संरक्षक लोकेंद्र सिंह कालवी की जयपुर में आयोजित हुंकार रैली में आयोजकों से भी कम भीड़ जुटने को इसकी बानगी के तौर पर देखा जा सकता है। दरअसल राजस्थान के ग्रामीण अंचल में शादी के कई वर्षों के बाद या फिर कई बेटियों के बाद पैदा हुए बेटे को बुरी नजर से बचाने के लिए उसका बेतुका या नकारात्मक भाव वाला नाम रखने की मान्यता रही है। इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि बचपन में बुरी नज़र से बचाने के लिए रखे गए ये नाम ही राजपूतों की बुरी छवि गढ़ने का आधार बन गए।

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