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लोकसभा चुनाव 2019: रीवा सीट पर दिलचस्प समीकरण

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ले पंगा न्यूज डेस्क, प्रीति दादूपंथी। लोकसभा चुनाव की तारीख तय होते ही राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारी तेज कर दी है। इसी क्रम में आज हम आपको एक दिलचस्प लोकसभा सीट के बारे में बता रहा है,जिसके हमेशा ही अप्रत्याशित परिणाम रहे है, यह सीट है मध्य प्रदेश की रीवा लोकसभा। इस बार रीवा में 6 मई को मतदान होना है। रीवा जिले के 16.66 लाख मतदाता प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करेंगे।

रविवार 10 मार्च की शाम को कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारी ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने लोकसभा निर्वाचन कार्यक्रम की जानकारी दी। जिसके अनुसार लोकसभा क्षेत्र-10 रीवा के लिए अधिसूचना 10 अप्रैल को जारी की जाएगी। इसी दिन से नामांकन पत्र दाखिल होने शुरू होंगे, जो 18 अप्रैल तक दाखिल किए जा सकेंगे। इन नामांकन पत्रों की जांच 20 अप्रैल को होगी, 22 अप्रैल तक उम्मीदवार नाम वापस ले सकते है। इसके बाद उम्मीदवारों की सूची जारी की जाएगी साथ ही उम्मीदवारों को चुनाव चिन्ह आवंटित किए जाएंगे। जिले के सभी मतदान केन्द्रों पर 6 मई को ईवीएम एवं वीवीपैट मशीन के माध्यम से मतदान कराया जाएगा। जिला मुख्यालय पर 23 मई को मतगणना होगी। जिला निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि, “लोकसभा चुनाव पूरी तरह से निष्पक्ष सम्पन्न कराए जाएंगे।”

रीवा से आते है अप्रत्याशित परिणाम

रीवा लोकसभा से कई बार अप्रत्याशित परिणाम सामने आए है। यहां के महाराजा मार्तण्ड सिंह तीन बार संसद तक पहुंचे लेकिन कोई मुद्दा नहीं उठाया। जिसके बाद देश के पहले नेत्रहीन सांसद यमुना प्रसाद शास्त्री भी दो बार यहीं से चुने गए। 1991 में रीवा लोकसभा सीट पर सबसे अधिक चौंकाने वाला परिणाम सामने आया। जब पहली बार प्रदेश में बसपा सांसद के रूप में भीम सिंह पटेल जीते थे। शिक्षक रहे भीम सिंह ने विंध्य के दिग्गज नेता श्रीनिवास तिवारी को हराकर यह उपलब्धि प्राप्त की थी।
इसके बाद से बसपा ने कई बार यहां से चुनाव जीते और भाजपा को मात्र 3 बार ही जीत हासिल हुई। 2014 में भाजपा की ओर से जनार्दन मिश्रा मैदान में उतरे तो उनके सामने कांग्रेस से सुंदरलाल तिवारी और बसपा से सांसद रहे देवराज पटेल सामने थे। साधारण परिवार के जनार्दन को कमजोर प्रत्याशी कहा जा रहा था लेकिन जनता ने उनकी सादगी को पसंद किया और मोदी लहर में 1.68 लाख वोटों से जीत दिलाई। जबकि ज्यादातर चुनावों में त्रिकोणीय मुकाबला रहा है।

जिले में आठ विधानसभा सीट

रीवा लोकसभा सीट में जिले की ही आठ विधानसभा सीटें आती है। जिसमें सिरमौर, सेमरिया, त्योंथर, मऊगंज, देवतालाब, मनगवां, रीवा और गुढ़ की सीटे शामिल है। 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में पहली बार सभी आठ सीटें जीतते हुए भाजपा ने क्लीन स्वीप किया है। रीवा लोकसभा क्षेत्र में 1666864 मतदाता है।

रोजगार मुख्य मुद्दा

रीवा पहाड़ी क्षेत्र और पिछड़े जिलों में से एक है। जहां बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य एवं शिक्षा के मुद्दो के साथ-साथ रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा है। यहां रोजगार नहीं होने से लोग दूसरे राज्यों में पलायन करते है। जिले का तराई क्षेत्र डकैती प्रभावित रहा है साथ ही सीमावर्ती इलाकों में जंगली क्षेत्र होने के कारण नीलगाय और जंगली सुअरों से किसान त्रस्त है।

जातीय समीकरण

रीवा आर्थिक रूप से पिछड़ा व पूर्व में राजशाही रहने के कारण जातीवाद सिर चढ़कर हावी है। यहां ब्राह्मण व क्षत्रिय समाज का बोलबाला है। सभी विधानसभा में ब्राह्मणों की संख्या अधिक है। इसके बाद दूसरे नम्बर पर पटेल (कुर्मी) आते है। इसके अलावा क्षत्रिय भी कुछ क्षेत्रों में हार-जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। रीवा विधानसभा में वैश्य समाज सवा लाख से अधिक है और एक तरफ ही इनका झुकाव रहा है। वहीं सिंधी और बाहरी लोगों की भूमिका भी प्रभावी है। रीवा संसदीय क्षेत्र में 16 लाख 66 हजार के करीब मतदाता है। जिनमें सबसे अधिक ब्राह्मण मतदाता 5 लाख के आसपास है। वहीं कुर्मी सवा दो लाख और क्षत्रिय मतदाता सवा एक लाख के करीब है। इसके अलावा अन्य पिछड़े एवं एससी, एसटी वर्ग के मतदाताओं का प्रभाव है।

बड़े नेता का दखल

भाजपा- भाजपा में करीब 15 वर्षं तक प्रदेश सरकार में मंत्री रहे राजेन्द्र शुक्ला पॉवरपुल रहे है। जिसे चाहा उसे हाशिए पर पहुंचा दिया। सरकार जाने के बाद भी अधिकांश विधायक और संगठन के नेता उनके साथ है। यहां संगठनात्मक कार्यप्रणाली होने के चलते दूसरे नेताओं का दखल कम है। कांग्रेस एक ऐसी पार्टीं है जिसमें प्रदेश के हर नेता का गुट मौजूद है। श्रीनिवास तिवारी के निधन के बाद पूर्वं नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह का कार्यंकताओं में दखल बढ़ा है। यहां कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुरेश पचौरी के भी समर्थक है। स्थानीय स्तर पर राज्यसभा सांसद राजमणि पटेल, पूर्वमंत्री पुष्पराज सिंह, सुंदरलाल तिवारी, अभय मिश्रा, सुखेन्द्र सिंह, गुरमीत सिंह मंगू सहित अन्य कई नेताओं का अपना गुट और प्रभाव है।

1999 के बाद से नहीं जीत पाई कांग्रेस

1952 में रीवा लोकसभा सीट का गठन किया गया था। पहले सांसद के रूप में कांग्रेस के रामभान सिंह तिवारी चुने गए थे। 1952 से लेकर अभी तक में छह बार कांग्रेस, तीन बार भाजपा एवं तीन बार बसपा ने जीत हासिल की है। एक बार भारतीय लोकदल एवं जनता पार्टी से यमुना प्रसाद जीते थे। वहीं दो बार निर्दलीय मार्तण्ड सिंह निर्वाचित हुए थे। कांग्रेस 1999 के बाद चुनाव नहीं जीत पाई है। इस चुनाव में कांग्रेस वापसी के लिए रणनीति बना रही है, तो भाजपा विधानसभा चुनाव में जिले की 8 विधानसभा सीटें जीतने को लेकर उत्साहित है। उसका मानना है कि उनकी जीत सुनिश्चित है। बसपा भी पूरे दम-खम के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है।

रीवा जिले में जातियों का प्रतिनिधित्व

सांसद- लोकसभा (ब्राह्मण)
राज्यसभा (पिछड़ा वर्ग-पटेल)
विधायक-ब्राह्मण 4, क्षत्रिय 2
पिछड़ावर्ग (कुर्मी) एक एवं अनुसूचित जाति एक
महापौर- वैश्य समाज
जिला पंचायत अध्यक्ष- ब्राह्मण
जातियों की अनुमानित संख्या
कुल मतदाता- 16.66 लाख
ब्राह्मण – 05 लाख
पटेल- 2.25 लाख
क्षत्रिय- 1.25 लाख
वैश्य- 02 लाख
कुशवाहा- 1.10 हजार
मुस्लिम- 80 हजार
अजा- 2.20 लाख
अजजा- 1.50 लाख
अन्य-80 हजार
नोट- ये आंकड़े संबंधित जातियों के लोगों के दावे के अनुसार है।

लोकसभा सीट पर लड़े 76 प्रत्याशी

1991 में मध्यावधि चुनाव में भीम सिंह के रूप में बसपा ने रीवा से पहला सांसद दिया था। 1996 के रीवा संसदीय सीट पर चुनाव में 76 प्रत्याशियों ने मैदान में उतरकर सबको अचंभित कर दिया था। उस वक्त रीवा संसदीय क्षेत्र में 1281032 लाख मतदाता थे। 1996 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी बुद्धसेन पटेल ने भाजपा की महारानी प्रवीण कुमारी को हराकर जीत हासिल की थी। रीवा संसदीय सीट पर बसपा दूसरी बार जीतीं थी।

लोकसभा में नहीं जीतीं महिलाएं

2014 के लोकसभा चुनाव में कोई महिला चुनाव मैदान में नहीं थी, लेकिन 1984 से 2009 तक महिलाएं रीवा लोकसभा के चुनाव में भाग लेती रही है। जिसमें प्रमुख रूप से रीवा राजघराने की राजमाता प्रवीण कुमारी सिंह दो बार मैदान में उतरीं लेकिन जनता ने उनको नकार दिया। उनके अलावा विमला सोंधिया, शीला देवी, प्रेमवती, कलावती सोनी, रेखा रंजन सिंह आदि महिलाएं 2009 तक चुनावों में उतरती रहीं लेकिन कोई महिला चुनाव नहीं जीत पाई। राजनीति में महिलाओं की कम भागीदारी इस बात की ओर इशारा करती है कि तमाम राजनीतिक दल महिलाओं को मुखौटे की तरह इस्तेमाल करती हैं।

2014 में 14-14 का संयोग

लोकसभा के 2014 के चुनाव में अंकों का अजीव संयोग सामने आया। 2014 के चुनाव में रीवा सहित सीधी, सतना और शहडोल में 14-14 उम्मीदवार मैदान में रह गए थे। चारों जिले में चुनाव लड़ने के लिए कई उम्मीदवारों ने पर्चे भरे थे,लेकिन वापसी के बाद 14 का संयोग बना।

अब तक के सांसद
1952- राजभान तिवारी, कांग्रेस
1957 व 1962- शिवदत्त उपाध्याय कांग्रेस
1967- शंभूनाथ शुक्ला कांग्रेस
1971- मार्तण्ड सिंह जूदेव निर्दलीय
1977 यमुना प्रसाद शास्त्री भारतीय लोकदल
1980 मार्तण्ड सिंह जूदेव निर्दलीय
1984 मार्तण्ड सिंह जूदेव कांग्रेस
1989 यमुना प्रसाद शास्त्री जनता पार्टी
1991 भीम सिंह पटेल बसपा
1996 बुद्धसेन पटेल बसपा
1998 चंद्रमणि त्रिपाठी भाजपा
1999 सुंदरलाल तिवारी कांग्रेस
2004 चंद्रमणि त्रिपाठी भाजपा
2009 देवराज सिंह पटेल बसपा
2014 जनार्दन मिश्रा भाजपा

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