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लोकसभा चुनाव 2019: वसुंधरा राजे को किया किनारे

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ले पंगा न्यूज डेस्क, प्रीति दादूपंथी। आगामी लोकसभा चुनाव के लिए राजस्थान में टिकट तय होने है और बीजेपी के राजस्थान के चुनाव प्रभारी प्रकाश जावड़ेकर टिकट तय करने के लिए बैठकें कर रहे है। इस बीच बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने राजस्थान के दो नेताओं को दिल्ली बुलाकर फीडबैक लिया है। जिसमें विधानसभा में विपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया और उप नेता राजेंद्र राठौड़ शामिल है। शाह इन नेताओं से वहां की स्थिति को परख कर यह सुनिश्चित करेंगे कि टिकट किसे देना है और किसे नहीं। वहीं वसुंधरा राजे राजस्थान में लोकसभा चुनाव में न तो टिकट बांटने की ड्राईविंग सीट पर नज़र आ रही हैं और न ही कैंपेन की रणनीति में, वह बिल्कुल अलग-थलग है। यहीं नहीं टिकट चाहने वाले नेताओं की भीड़ अब राजे के सरकारी आवास पर नहीं देखी गई है।

टिकट चाहने वाले सीधे दिल्ली और अमित शाह के चक्कर काट रहे है।

आपको बता दें कि वसुंधरा राजे लंबे अर्से के बाद बुधवार को जयपुर में कोर कमेटी की बैठक में बतौर सदस्य ही नज़र आई। इन सभी संकेतों से यही लग रहा है कि राजस्थान में पिछले 16 सालों में पहली बार चुनाव में टिकटों का फैसला राजे नहीं करेंगी। हालांकि इस बार टिकट का फैसला बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह करेंगे।

इस बार के लोकसभा चुनाव में वसुंधरा को किनारे किया जा रहा है। इसके संकेत चुनाव तारीख़ों के ऐलान होने से एक महीने पहले ही मिल गया था, जब राजे को तीनों राज्यों के चुनाव का प्रभारी बना दिया गया था। इससे यह स्पष्ट था कि बीजेपी के शीर्ष नेता लोकसभा चुनाव से वसुंधरा राजे को राजस्थान की राजनीति से दूर रखना चाहते है। ऐसे में एक और सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या अब राजे के समर्थक सांसदों के टिकट भी कटेंगे? गौरतलब है कि राजस्थान में 25 में से 23 सांसद बीजेपी के हैं और उनमें से भी 11 सांसदों पर तलवार लटकी हुई है। ‘इंदिरा इज़ इंडिया एंड इंडिया इज़ इंदिरा’ पांच साल पहले राजस्थान में वसुंधरा राजे के लिए उनके समर्थक भी इसी तरह का नारा दिया करते थे। राजस्थान में वसुंधरा राजे का ऐसा वर्चस्व था कि वसुंधरा ही बीजेपी और बीजेपी ही वसुंधरा थीं। 3 माह पूर्व तक यह तस्वीर थी, जब वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री थीं लेकिन अब तस्वीर इससे उलट हो गई है।

विधानसभा चुनाव के बाद किया किनारे

दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनाव हारने के बाद से ही वसुंधरा राजे को किनारे करने की शुरुआत हो गई थी। जबकि राजे विपक्ष की नेता बनना चाहती थी, लेकिन पार्टी ने उन्हें विपक्ष के नेता के चुनाव से एक दिन पहले ही शिवराज सिंह और रमन सिंह के साथ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया। इसके अलावा पार्टी नेतृत्व ने पुराने भरोसेमंद और संघ की पसंद के गुलाब चंद कटारिया को विपक्ष का नेता और राजे की नापसंद राजेंद्र राठौड़ को उप नेता बना दिया। हालांकि विपक्ष के नेता के चुनाव की बैठक के दौरान कटारिया का नाम पहले से तय हो गया था, इसके बावजूद राजे के समर्थकों ने राजे का नाम विपक्ष के नेता के तौर पर पेश किया था और विधायकों से समर्थन भी करवा दिया था। इसके साथ ही राजे ने परोक्ष रुप से उस समय ही अपनी ताकत दिखा दी थी कि विधायक उनके साथ है, भले ही विपक्ष का नेता किसी और को ही क्यों न चुन लिया जाए।

अमित शाह, मोदी मंत्रिमंडल में कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को राजस्थान बीजेपी की कमान सौंपना चाहते थे। पीएम मोदी की भी पसंद शेखावत थे। फिर राजे ने वीटो कर दिया और पार्टी में अपने वफ़ादार जाट नेताओं के ज़रिए विरोध करवाया, कि इससे जाट समुदाय आने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी से दूर हो सकते हैं। ख़ुद राजे ने भी कह दिया कि वह, ‘राजपूत कोटे से मुख्यमंत्री हैं और दूसरा प्रदेश अध्यक्ष भी राजपूत नहीं हो सकता।’

राजे के विरोध के चलते मोदी-अमित शाह को राजस्थान में विधानसभा चुनाव से पहले राजे के विकल्प की तलाश की योजना को ठंडे बस्ते में डालना पड़ा था। वहीं, एक न्यूट्रल और लो प्रोफ़ाइल नेता मदनलाल सैनी को अध्यक्ष बनाने पर समझौता करना पड़ा था, तब इसे राजे की जीत माना गया। तब से एक बार फिर यह धारणा मज़बूत हो गई थी कि राजस्थान में बीजेपी की चौधराहट तो राजे के पास ही रहेगी, पार्टी नेतृत्व चाहे या न चाहे।

आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वसुंधरा राजे के बीच रिश्ते कभी भी सहज नहीं रहे हैं। फिर 2018 की शुरुआत में दो लोकसभा और एक विधानसभा सीट पर उप चुनाव में बीजेपी की हार के बाद ही मोदी और अमित शाह ने राजस्थान में राजे का विकल्प खड़़ा करने का मन बना लिया था। इस हार के बाद वसुंधरा राजे के नज़दीकी राजस्थान बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक परनामी का इस्तीफ़ा ले लिया गया।

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