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17 मार्च को आमलकी एकादशी, जाने विधान और महत्व

धर्म,

ले पंगा न्यूज डेस्क, प्रीति दादूपंथी। 17 फरवरी को आमलकी एकादशी मनाई जाएगी। आमलकी एकादशी को आमलक्य एकाद17 मार्च को आमलकी एकादशी, जाने विधान और महत्वशी भी कहा जाता है। आमलकी का मतलब आंवला होता है, जिसे हिन्दू धर्म और आयुर्वेद दोनों में श्रेष्ठ बताया गया है। पद्म पुराण के अनुसार आंवले का वृक्ष भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का वास होता है। इस दिन आंवले का उबटन, आंवले के जल से स्नान, आंवला पूजन, आंवले का भोजन और आंवले का दान करना चाहिए। वहीं इसी दिन रंगभरनी एकादशी भी मनाई जाती है, जिसमें भगवान शिव को रंग लगाकर होली की तैयारियों की शुरुआत की जाती है। यही वजह है कि इस दिन शिव और विष्णु भक्तों दोनों के लिए खासा महत्व रखता है।

आमलकी एकादशी व्रत का महत्त्व

पद्म पुराण के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के थूकने से आंवले का वृक्ष बना। यही कारण है कि इस वृक्ष में विष्णु जी का वास माना जाता है। आंवले के वृक्ष की जड़ में भगवान विष्णु, बीच में भगवान शिव और ऊपर ब्रह्मा जी का वास होता है। मान्यताओं के अनुसार आमलकी एकादशी का व्रत करने से सैकड़ों तीर्थ दर्शन के समान पुण्य प्राप्त होता है। समस्त यज्ञों के बराबर फल देने वाले आमलकी एकादशी व्रत को करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो लोग आमलकी एकादशी का व्रत नहीं करते है वह भी इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु को आंवला अर्पित करें और स्वयं भी खाएं। शास्त्रों के अनुसार आमलकी एकादशी के दिन आंवले का सेवन करना बहुत लाभकारी होता है।

पौराणिक कथा

प्राचीन काल में चित्रसेन नामक राजा राज्य करता था। उसके राज्य में एकादशी व्रत का बहुत महत्व था और पूरी प्रजा एकादशी का व्रत करते थे। वहीं राजा की आमलकी एकादशी के प्रति बहुत श्रद्धा थी। एक दिन राजा शिकार करते हुए जंगल में बहुत दूर तक निकल गये। तभी कुछ जंगली और पहाड़ी डाकुओं ने राजा को घेर लिया। इसके बाद डाकुओं ने शस्त्रों से राजा पर हमला कर दिया। किंतु देव कृपा से राजा पर जो भी शस्त्र चलाए जाते वो पुष्प में बदल जाते।

डाकुओं की संख्या अधिक होने से राजा संज्ञाहीन होकर धरती पर गिर गए। तभी राजा के शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई और समस्त डाकुओं को मारकर अदृश्य हो गई। जब राजा की चेतना लौटी तो, उसने सभी डाकुओं को मृत पाया। यह देखकर राजा को आश्चर्य हुआ कि इन डाकुओं को किसने मारा? तभी आकाशवाणी हुई- हे राजन! यह सब डाकू तुम्हारे आमलकी एकादशी का व्रत करने के प्रभाव से मारे गए है। तुम्हारी देह से उत्पन्न आमलकी एकादशी की वैष्णवी शक्ति ने इनका संहार किया है। वह इन्हें मारकर पुन: तुम्हारे शरीर में प्रवेश कर गई।यह सुनकर राजा प्रसन्न हुआ और वापस लौटकर राज्य में सबको एकादशी का महत्व बतलाया।

आमलकी एकादशी व्रत की पूजा विधि

आमलकी एकादशी में आंवले का विशेष महत्व है। इस दिन पूजन से लेकर भोजन तक हर कार्य में आंवले का उपयोग होता है। आमलकी एकादशी की पूजा विधि इस प्रकार है:

  1. इस दिन सुबह उठकर भगवान विष्णु का ध्यान कर व्रत का संकल्प करना चाहिए।
  2. व्रत का संकल्प लेने के बाद स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु की पूजा करना चाहिए। घी का दीपक जलाकर विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  3. पूजा के बाद आंवले के वृक्ष के नीचे नवरत्न युक्त कलश स्थापित करना चाहिए। अगर आंवले का वृक्ष उपलब्ध नहीं हो तो आंवले का फल भगवान विष्णु को प्रसाद स्वरूप अर्पित करें।
  4. आंवले के वृक्ष का धूप, दीप, चंदन, रोली, पुष्प, अक्षत आदि से पूजन कर उसके नीचे किसी गरीब, जरुरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए।
  5. इस के बाद आंवले के वृक्ष की 9 बार या 27 बार परिक्रमा करनी चाहिए। अंत में सौभाग्य और उत्तम स्वास्थ्य की कामना करनी चाहिए। इस दिन आंवलें का पौधा लगाना भी अतिउत्तम माना गया है।
  6. अगले दिन यानि द्वादशी को स्नान कर भगवान विष्णु के पूजन के बाद जरुरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को कलश, वस्त्र और आंवला आदि दान करना चाहिए। इसके बाद भोजन ग्रहण कर उपवास खोलना चाहिए।

रंगभरी एकादशी

आपको बता दें कि इस दिन रंगभरी एकादशी के अवसर पर बाबा विश्वनाथ को दूल्हे के रूप में सजाया जाता है और मां गौरा का गौना करवाया जाता है। रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शिव माता पार्वती को विवाह के बाद पहली बार उन्हें अपनी नगरी काशी लाए थे। इस खुशी में भगवान शिव के गण रंग-गुलाल उड़ाते और खुशियां मनाते हुए आए थे। रंगभरी एकादशी को बाबा विश्वनाथ अपने भक्तों के साथ रंग और गुलाल से होली खेलते है। इस दिन भोलेनाथ की नगरी रंगों से सराबोर होती है, हर भक्त रंग और गुलाल में मस्त होता है।

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